मध्य प्रदेश के रीवा शहर में सरकारी चिकित्सा व्यवस्था की विश्वसनीयता और निजी अस्पतालों के गठजोड़ को उघाड़ता हुआ एक अत्यंत दुखद मामला सामने आया है। खुटेही (विश्वविद्यालय थाना क्षेत्र) निवासी और शासकीय इंजीनियरिंग कॉलेज के 21 वर्षीय अंतिम वर्ष के छात्र अक्षत शुक्ला (पिता सुभाष शुक्ला) की इलाज के दौरान संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। परिजनों का सीधा आरोप है कि मेडिकल कॉलेज में पदस्थ डॉक्टरों की लापरवाही, गलत डायग्नोसिस और निजी अस्पताल को फायदा पहुंचाने की नीयत ने एक होनहार छात्र की बलि ले ली। घटना के बाद अस्पताल परिसर में जमकर हंगामा हुआ, जिसके बाद पुलिस को दखल देना पड़ा।

सरकारी अस्पताल की छवि खराब कर निजी क्लिनिक में भर्ती करने का खेल
परिजनों द्वारा लगाए गए आरोपों के मुताबिक, जब अक्षत की तबीयत बिगड़ी तो वे इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचे थे। वहां मेडिकल कॉलेज में कार्यरत डॉ. मुकेश तिवारी ने मरीज का परीक्षण करने के बजाय संजय गांधी मेमोरियल अस्पताल (SGMH) की व्यवस्थाओं को ही सुविधाहीन बताना शुरू कर दिया। उन्होंने परिजनों को दावा किया कि सरकारी अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड और मेडिसिन विभाग में कोई पुख्ता इंतजाम नहीं हैं, इसलिए मरीज को प्रार्थना अस्पताल में भर्ती कराना ही बेहतर होगा। डॉक्टर के इस परामर्श पर भरोसा करते हुए परिजन अक्षत को प्रार्थना अस्पताल ले गए। हालांकि, सूत्रों का यह भी कहना है कि इससे पूर्व मरीज को संजीवनी अस्पताल में भी ले जाया गया था, जिसका संचालन भी पूर्व में बिना लाइसेंस के होने की बात सामने आई थी।
बिना किसी ठोस परीक्षण के गलत इलाज और खून की उल्टी से मृत्यु
प्रार्थना अस्पताल में भर्ती होने के बाद मरीज के साथ जो हुआ, उसने चिकित्सा नैतिकता की धज्जियां उड़ा दीं। परिजनों का कहना है कि डॉक्टरों ने बिना किसी प्रामाणिक लैब टेस्ट या रिपोर्ट के छात्र को सीधे टीबी (तपेदिक) का मरीज घोषित कर दिया। इसके बाद बिना सोचे-समझे उसे भारी मात्रा में दवाएं दी गईं। महज कुछ ही घंटों के भीतर दवाइयों के घातक दुष्प्रभाव से मरीज की तबीयत इतनी ज्यादा बिगड़ गई कि वह खून की उल्टियां करने लगा और देखते ही देखते उसने दम तोड़ दिया। जो डॉक्टर कुछ समय पहले मरीज के पूरी तरह ठीक होकर घर लौटने का आश्वासन दे रहे थे, वे अचानक मरीज की मृत्यु के बाद पल्ला झाड़ते नजर आए।
रात में परिजनों का आक्रोश, डॉक्टरों की क्लास और पूर्व निष्कासन का इतिहास
छात्र की मौत के तुरंत बाद परिजनों को बिना उचित जानकारी दिए शव को बाहर करने का प्रयास किया गया, जिससे पीड़ित परिवार का गुस्सा फूट पड़ा। देर रात अस्पताल परिसर में जमकर हंगामा हुआ और सूचना मिलते ही समान थाना पुलिस मौके पर पहुंची। आक्रोशित परिजनों और पुलिस के सामने इलाज करने वाले डॉक्टरों को तलब होना पड़ा, जहां उनसे सख्त सवाल-जवाब किए गए। रात में पहुंचे डॉ. राहुल कुंदेर ने सफाई दी कि मरीज को अत्यंत गंभीर हालत में वेंटिलेटर पर रखा गया था और परिजनों को स्थिति की सूचना दी गई थी, परंतु परिजनों ने उनके तर्कों को पूरी तरह खारिज कर दिया।

उल्लेखनीय है कि प्रार्थना अस्पताल पहले भी इस तरह के घोटालों के लिए चर्चित रहा है। इससे पूर्व जीएमएच के गायनी विभाग से मरीज को प्रार्थना अस्पताल शिफ्ट करने और वहां ऑपरेशन करने के गंभीर आरोप में डॉ. सोनल अग्रवाल को सेवा से बर्खास्त किया जा चुका है। अब वही पैटर्न डॉ. मुकेश तिवारी और डॉ. संदीप पटेल के मामले में दोहराया जाता दिख रहा है।
सरकारी दावों की खुली पोल और प्रशासनिक कार्रवाई पर उठते सवाल
यह पूरा घटनाक्रम प्रदेश के स्वास्थ्य महकमे और जनप्रतिनिधियों के उन बड़े-बड़े दावों की हवा निकालता है, जिनमें सरकारी डॉक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की बातें कही गई थीं। पूर्व में भी ऐसे मामलों पर कड़े बयान जारी किए गए थे, लेकिन जमीनी हकीकत में कोई बदलाव नहीं आया। मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर खुलेआम अपनी ड्यूटी छोड़कर निजी अस्पतालों में मरीजों को भर्ती करवा रहे हैं और गलत इलाज के कारण निर्दोष नागरिकों की जान जा रही है।
अब पूरे रीवा शहर की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि मेडिकल कॉलेज के डीन और जिला प्रशासन इस मामले में आरोपी डॉक्टरों पर क्या कड़ी दंडात्मक कार्रवाई करते हैं, या फिर यह मामला भी केवल औपचारिक जांच के कागजों में दबकर रह जाएगा।
पैसों के लालच में भर्ती और विशेषज्ञ डॉक्टरों की सरासर अनुपस्थिति
घटना की शुरुआत तब हुई जब अचानक तबीयत बिगड़ने पर परिजन अक्षत को रीवा के संजीवन अस्पताल लेकर पहुंचे। आरोप है कि अस्पताल प्रबंधन ने मरीज की गंभीर स्थिति को ताड़ते हुए भी उसे फौरन भर्ती कर लिया, ताकि वे अपने बिल का कोटा पूरा कर सकें। वास्तविकता यह थी कि इस निजी संस्थान में गंभीर और आपातकालीन मामलों को संभालने के लिए कोई भी वरिष्ठ या योग्य विशेषज्ञ चिकित्सक मौजूद नहीं था। जूनियर और अप्रशिक्षित कर्मचारियों के भरोसे मरीजों की जिंदगी दांव पर लगाई जा रही थी। पैसों की भूख में इन अस्पतालों ने यह तक नहीं सोचा कि बिना विशेषज्ञ के इलाज करना एक युवा की जान ले सकता है।
संजीवन से प्रार्थना अस्पताल तक: रेफरल के नाम पर जानलेवा खेल और लापरवाही
जब संजीवन अस्पताल में स्थिति पूरी तरह नियंत्रण से बाहर होने लगी और डॉक्टरों के हाथ-पैर फूल गए, तब उन्होंने अपनी नाकामी और गलती को छुपाने के लिए एक नया पैंतरा चला। बिना किसी ठोस चिकित्सीय कारण या परिजनों को भरोसे में लिए, मरीज को चुपचाप प्रार्थना अस्पताल के लिए रेफर कर दिया गया। एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल की इस उठापटक और भागदौड़ में अक्षत के शरीर पर दवाओं के गलत और भारी डोज का विपरीत प्रभाव पड़ा। दोनों अस्पतालों का यह आपसी गठजोड़ केवल आर्थिक दोहन और मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ करने का जरिया बनकर रह गया है।
छात्र की दर्दनाक मौत और अस्पताल संचालक का गोल-गोल जवाब
प्रार्थना अस्पताल में वेंटिलेटर और ऑक्सीजन पर रखे जाने के बावजूद जब छात्र ने दम तोड़ दिया, तो कोहराम मच गया। मौत के बाद जब शोकाकुल परिजनों और स्थानीय लोगों ने अस्पताल के मुख्य गेट पर पहुंचकर संचालकों से कड़े सवाल पूछने चाहे, तो उनकी बोलती बंद हो गई। कैमरे और परिजनों के सामने अस्पताल संचालक और जिम्मेदार डॉक्टर गोल-गोल और टालमटोल वाले जवाब देते नजर आए। वे इस बात का कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाए कि बिना विशेषज्ञ के इलाज क्यों किया गया, अचानक भारी मात्रा में दवाएं क्यों दी गईं और बिना बताए मरीज को शिफ्ट क्यों किया गया। अपने गुनाहों को छुपाने के लिए उन्होंने अंदर से दरवाजे बंद कर लिए और सुरक्षा कर्मियों को आगे कर दिया।
परिजनों का फूटा गुस्सा, हंगामा और पुलिस थाने में न्याय की गुहार
इंजीनियरिंग के छात्र की इस संदिग्ध और दर्दनाक मौत के बाद रीवा के नागरिकों और परिजनों का गुस्सा फूट पड़ा। अस्पताल परिसर में जमकर हंगामा हुआ, जिसके बाद मौके पर पहुंची पुलिस ने स्थिति को संभाला। पीड़ित पिता ने समान थाने में लिखित शिकायत दर्ज कराते हुए संजीवन अस्पताल और प्रार्थना अस्पताल के संचालकों व डॉक्टरों के खिलाफ हत्या और मेडिकल लापरवाही का मामला दर्ज करने की मांग की है। लोग अब इस बात पर अड़े हैं कि जब तक इन झोलाछाप स्टाइल में चल रहे निजी अस्पतालों के लाइसेंस रद्द नहीं होंगे और दोषियों की गिरफ्तारी नहीं होगी, तब तक चैन से नहीं बैठेंगे।


