कई लोगों की सुबह जल्दी उठने की आदत होती है तो कई लोगों को जल्दी उठने में तकलीफ होती है. बड़े बुजुर्ग छोटों और बच्चों को अकसर इस बात पर डांट लगाते देखे जाते हैं कि वे जल्दी क्यों नहीं उठते. लेकिन इसके लिए केवल हमारी आदतें ही जिम्मेदार है? एक अध्ययन से पता चला है कि अगर आप की सुबह देर से उठने की आदत है तो इसके लिए आप नहीं आपके पूर्वज जिम्मेदार हैं. जीनोम बायोलॉजी एंड इवोल्यूशन के शोध में ऐसे संकेत मिले हैं जो बताते हैं कि आज इंसानों के पुरातन संबंधी निएंडरथॉल के डीएनए और जीन की वजह से कई इंसानों में सुबह जल्दी उठने की आदत आई होगी और ऐसा सबके साथ नहीं है.
पूर्वजों के दो संबंधी
विश्लेषण में पाया गया है कि आधुनिक मानव के दो पुरातन संबंधी निएंडरथॉल और डेनिसोवन से ऐसे जीन आज के इंसानों तक आते रहे जो कुछ लोगों में सुबह जल्दी उठने की आदत के लिए जिम्मेदार हैं. अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के टोनी कैप्रा की अगुआई में यह अध्ययन किया गया है. कैप्रा का कहना है कि उन्हें इस नतीजे की उम्मीद नहीं थी.
ठंडे और अंधेरे वातावरण में
यह संभव है कि निएंडरथॉल और डेनिसोवन, हमारे अन्य पूर्वजों की तुलना में लंबे समय तक ठंडे और अंधेरे वातावरण में रहे थे. आज के आधुनिक मानव के अधिकांश जीन होमोसेपियन्स से आए थे, जो अफ्रीका में रहते थे. वैज्ञानिकों को मानना है कि होमोसेपियन्स से पहले हमारे पूर्वजों ने कई कई अनुवांशिकीय पदार्थ निएंडरथॉल और डेनिसोवन सहित विलुप्त हो चुकी अन्य मानव प्रजातियों से भी लिए थे.
पूर्वजों के म्यूटेशन
इन जीन और उनके कई म्यूटेशन समय के साथ खत्म भी हो गए थे. न्यू साइंसटिस्ट की रिपोर्ट के अनुसार वैज्ञानिकों को लगता है कि यूरोप और एशिया के कई लोगों के जीनोम का दो फीसदी हिस्सा निएंडरथॉल का है और पांच फीसदी डेनिसोवन का है. दोनों ही अफ्रीका में,हमारे सीधे पूर्वजों से लाखों साल पहले रहा करते थे. पश्चिमी और उत्तरी यूरेशिया के ठंडे और अंधरे वाले वातवरण में लंबे समय तक रहने के कारण उनके जीन में प्रभाव पड़ता रहा.
अभी से नहीं लगी होगी आदत
वहीं हमारे हालिया पूर्वजों ने इस प्रकार के मौसम को केवल 50 से 60 हजार साल पहले ही झेलना शुरू किया था, जब यूरोप में बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ था. ऐसे में यह तार्किक बात लगती है कि निएंडरथॉल और डेनिसोवन से मिले जीन म्यूटेशन ने हमारे अंदर यूरोपीय सर्दियों में जल्दी उठने की आदत डालने में योगदान दिया हो. शोधकर्ताओं ने यही जानने का प्रयास किया क्या ऐसी कुछ डीएनए विविधताएं हैं जिनकी वजह से हमें जल्दी उठने की आदत के लिए जिम्मेदार हैं जिससे हमें छोटी सर्दियों से निपटने में मदद मिल सके.
लाखों जीनोम की तुलना
इसके लिए उन्होंने तीन निएंडरथॉल और एक डेनिसोवन जीनोम की लाखों आधुनिक मानव के जीनोम से तुलना की जो यूके बायोबैंक में जमा हैं. उन्होंने पाया कि निएंडरथॉल और डेनिसोवन और आज के आधुनिक मानव हजारों म्यूटेशन साझा करते हैं. इनमें से कई इंसान की बॉडी क्लॉक यानी आंतरिक घड़ी को नियंत्रित करने से संबंधित हैं. टाइम्स के अनुसार बायोबैंक के लोगों से पूछताछ कर वैज्ञानिकों ने पाया कि वे इन म्यूटेशन इन लोगों को जल्दी उठने वालों के तौर पर परिभाषित कर रहे हैं. इसी नतीजे ने शोधकर्ताओं को चौंका दिया था.
और अध्ययन की जरूरत?
जहां कुछ वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर और अधिक पुष्टि और शोध की जरूरत बता रहे हैं. फिर भी यह अध्ययन अपने आप में काफी कुछ संकेत देता है. बायोबैंक के अध्ययन केवल लक्षणों या बर्ताव का जीन से संबंध बताते हैं. लेकिन खास जीन से संबंध के लिए बेशक वैज्ञानिकों और गहन कार्य करना होगा. शोधकर्ताओं का भी यही कहना है. वे मानते हैं कि इस मामले में और भी कई कारक योगदान देते हैं.
वहीं कई वैज्ञानिक मानते हैं कि इस शोध ने गंभीर विषय देने का काम किया है और यह अन्य शोधकार्यों को भी दिशा देने का काम कर सकता है. द टाइम्स को दिए अपने बयान में एस्टोनिया की यूनिवर्सिटी ऑफ टॉर्टू के अनुवांशिकीविद माइकल डैनेमैन का तो यह भी कहना है कि इससे हमारे शरीर की घड़ी में जरूरी बदलाव करने को लेकर हो रहे शोधों में को भी दिशा मिल सकती है.


