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October 31, 2026 5:44 pm

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“सरकारी कुर्सी, अवैध अस्पताल और प्रार्थना में मौत का खेल! डॉ. मुकेश तिवारी पर 1 साल पहले दिए गए FIR के आदेश फाइलों में क्यों दबे?”

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मध्य प्रदेश के विंध्य संभाग के सबसे बड़े शहर रीवा में स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की पोल एक बार फिर एक युवा छात्र की असमय मौत ने खोल दी है। शहर के खुटेही इलाके के रहने वाले 21 वर्षीय इंजीनियरिंग छात्र अक्षत शुक्ला की जान सिर्फ इसलिए चली गई क्योंकि पूरा स्वास्थ्य विभाग और निजी अस्पतालों का माफिया तंत्र हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा। इस मामले में केवल एक प्राइवेट अस्पताल के डॉक्टरों को दोषी ठहराना नाकाफी होगा, बल्कि इसके पीछे स्वास्थ्य विभाग की वह दागी कार्यप्रणाली है, जिसने एक साल पहले ही अवैध रूप से चल रहे अस्पताल पर शिकंजा कसा था, लेकिन बाद में साठगांठ कर उसे फिर से गुलजार कर दिया।

इंजीनियरिंग छात्र अक्षत शुक्ला के साथ क्या हुआ था?
मृतक अक्षत शुक्ला (पिता सुभाष शुक्ला) के परिजनों के अनुसार, उनकी तबीयत खराब होने पर उन्हें सबसे पहले शहर के जाने-माने चेस्ट एवं टीबी स्पेशलिस्ट डॉ. मुकेश तिवारी के क्लिनिक/अस्पताल ‘संजीवनी हॉस्पिटल एवं चेस्ट केयर’ में दिखाया गया था। डॉ. तिवारी ने मरीज की शुरुआती जांच करने के बाद परिजनों को डरा दिया और कहा कि मामले में गंभीर इंफेक्शन है। परिजनों को उम्मीद थी कि एक सरकारी मेडिकल कॉलेज के वरिष्ठ डॉक्टर होने के नाते वे मरीज को संजय गांधी मेमोरियल हॉस्पिटल (SGMH) भेजेंगे, लेकिन डॉक्टर ने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया।K

डॉक्टर का खेल: एसजीएमएच के प्रति डर, प्राइवेट का महिमामंडन
मृतक अक्षत के परिजनों ने जब सबसे पहले डॉ. मुकेश तिवारी के क्लिनिक में दिखाया था, तो उन्हें पूरी उम्मीद थी कि एक सरकारी मेडिकल कॉलेज के वरिष्ठ डॉक्टर होने के नाते वे मरीज को संजय गांधी मेमोरियल हॉस्पिटल (SGMH) रेफर करेंगे।

लेकिन इसके विपरीत, डॉक्टर ने परिजनों के मन में सरकारी अस्पताल के प्रति खौफ पैदा कर दिया। उन्होंने साफ कह दिया— “संजय गांधी अस्पताल में कोई सुविधा नहीं है, दवाइयां तक नहीं मिलतीं, वहां मरीज सुरक्षित नहीं है।” इसके बाद उन्होंने परिजनों को प्रार्थना अस्पताल में भर्ती कराने की सलाह दी।
परिजनों ने डॉक्टर की बात पर भरोसा किया और अक्षत को वहां एडमिट करा दिया। आरोप है कि बिना किसी पुख्ता और उच्च स्तरीय जांच के सीधे टीबी का भारी-भरकम डोज़ (Heavy Dose) देना शुरू कर दिया गया, जिसके साइड इफेक्ट्स से उस युवा छात्र की तड़प-तड़प कर मौत हो गई।

यदि तब कार्रवाई होती, तो बच जाती अक्षत की जान!
सवाल यह उठता है कि यदि एक साल पहले स्वास्थ्य विभाग ने कड़ाई दिखाते हुए डॉ. मुकेश तिवारी पर एफआईआर दर्ज कर दी होती और उनका अवैध अस्पताल हमेशा के लिए बंद रहता, तो आज डॉक्टर उस निजी नेटवर्क का हिस्सा नहीं होते। अक्षत के परिजन कभी गुमराह नहीं होते और छात्र का इलाज सीधे सरकारी मेडिकल कॉलेज में होता, जहाँ समय पर सही इलाज मिलने से उसकी जान बच सकती थी।

सिस्टम मौन, उठ रहे बड़े सवाल
आज एक 21 साल का होनहार छात्र दुनिया से जा चुका है, थाने में शिकायत भी दर्ज हो चुकी है, लेकिन रीवा के स्वास्थ्य विभाग और प्रशासनिक अमले के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही है। मुख्यमंत्री और डिप्टी सीएम के गृह जिले में यदि इस तरह की प्रशासनिक लाचारी और डॉक्टरों की मनमानी चलती रही, तो आम जनता किस पर भरोसा करेगी? फिलहाल, जिम्मेदार अधिकारियों के भोपाल दौरे और खामोशी ने इस पूरे मामले को रफा-दफा करने की आशंकाओं को और गहरा कर दिया है।

 

डॉ. मुकेश तिवारी की भूमिका और संजीवनी हॉस्पिटल का विवाद
इस पूरी त्रासदी में डॉ. मुकेश तिवारी की भूमिका बेहद संदग्ध और गंभीर रही है। एक सरकारी मेडिकल कॉलेज में पदस्थ डॉक्टर का इस तरह से मरीजों को अपने या अन्य निजी अस्पतालों (जैसे प्रार्थना अस्पताल) की तरफ डायवर्ट करना चिकित्सा आचार संहिता (Medical Ethics) के पूरी तरह खिलाफ है। मरीजों के मन में सरकारी अस्पताल (SGMH) के प्रति डर पैदा करना और निजी क्लीनिकों का महिमामंडन करना रीवा के स्वास्थ्य तंत्र में एक खुला खेल बन चुका है। डॉ. तिवारी ने अपनी प्रशासनिक और पेशेवर पहुंच का फायदा उठाते हुए मरीज की जान दांव पर लगा दी।

अक्टूबर 2025 की वो कार्रवाई जो फाइलों में दबकर रह गई
यह पूरा मामला केवल एक अस्पताल या एक डॉक्टर की लापरवाही तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे प्रशासनिक सुस्ती का एक बड़ा इतिहास है। ठीक एक साल पहले यानी अक्टूबर 2025 में रीवा के समान थाना अंतर्गत संचालित होने वाले डॉ. मुकेश तिवारी के ‘संजीवनी हॉस्पिटल एवं चेस्ट केयर’ पर स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन ने संयुक्त रूप से एक बड़ी छापामार कार्रवाई की थी।

उस रेड के दौरान यह खुलासा हुआ था कि वह अस्पताल पूरी तरह से अवैध रूप से संचालित हो रहा था। अस्पताल के पास संचालन के लिए कोई वैध लाइसेंस या अनुमति नहीं थी। इसके बावजूद वहां बड़ी-बड़ी और बिना लाइसेंस वाली जांच मशीनें स्थापित की गई थीं। मौके पर प्रशासनिक अधिकारियों ने अस्पताल को तुरंत सील कर दिया था और स्पष्ट निर्देश दिए थे कि डॉ. मुकेश तिवारी और इस अवैध संचालन से जुड़े अन्य जिम्मेदारों पर तत्काल एफआईआर (FIR) दर्ज की जाए।

सिस्टम की मिलीभगत: सील अस्पताल दोबारा कैसे खुला?
सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जिस अस्पताल को प्रशासन ने अवैध मानकर सील कर दिया था और जिस डॉक्टर पर एफआईआर के निर्देश दिए गए थे, वह अस्पताल कुछ ही समय बाद दोबारा कैसे चालू हो गया? सूत्रों और दस्तावेजों के संकेतों के मुताबिक, स्वास्थ्य विभाग के भीतर बैठे कुछ भ्रष्ट अधिकारियों ने मामले को ‘मैनेज’ (सेटेल) कर लिया।

न तो डॉक्टर मुकेश तिवारी पर कोई एफआईआर दर्ज की गई और न ही अवैध अस्पताल पर कानूनी शिकंजा कसा गया। यदि उस समय स्वास्थ्य विभाग ने कड़ाई दिखाते हुए नियमों का पालन किया होता और डॉक्टर पर एफआईआर दर्ज कर अस्पताल को permanently बंद रखा होता, तो आज डॉ. तिवारी उस निजी नेटवर्क का हिस्सा नहीं बनते और न ही अक्षत शुक्ला के परिजनों को गुमराह कर पाते। अक्षत सीधे सरकारी अस्पताल पहुंचते, जहां समय पर सही इलाज मिलने से उनकी जान बच सकती थी।

प्रशासन की चुप्पी और डिप्टी सीएम के गृह जिले में बदहाल स्वास्थ्य सेवाएं
एक 21 साल के युवा छात्र की दर्दनाक मौत के बाद भी रीवा के स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन के कान पर जूं तक नहीं रेंगुई है। थाने में परिजनों द्वारा शिकायत दर्ज कराने और सोशल मीडिया पर रीवा की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर तीखे सवाल उठाए जाने के बावजूद प्रशासनिक अमला खामोश बैठा है।

राज्य के उपमुख्यमंत्री (जो स्वास्थ्य विभाग से भी जुड़े हैं) के गृह जिले में इस तरह की लाचारी बेहद शर्मनाक है। बताया जा रहा है कि वर्तमान में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) भोपाल की किसी कार्यशाला में व्यस्त हैं, और उनके लौटने का इंतजार किया जा रहा है। स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि जब तक सीएमएचओ लौटेंगे, तब तक इस पूरे मामले को रफा-दफा करने की साजिश पूरी हो चुकी होगी। जिला कलेक्टर भी हालिया कुछ छापों के बाद से ऐसे ठंडे पड़े हैं कि आम जनता की मौतों पर भी कोई प्रशासनिक टीम गठित नहीं की जा रही है।

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