रीवा मध्य प्रदेश का एक प्रमुख संभाग है, जहाँ विंध्य क्षेत्र के लाखों लोग इलाज के लिए सरकारी और निजी अस्पतालों पर निर्भर हैं। पिछले कुछ महीनों में रीवा के मेडिकल कॉलेज, संजय गांधी अस्पताल (SGH), गांधी मेमोरियल (GM) अस्पताल और कई निजी नर्सिंग होम में इलाज में लापरवाही की घटनाओं ने आम जनता को झकझोर कर रख दिया है। मरीजों की जान जाने और गलत इलाज के गंभीर आरोपों के बीच जनप्रतिनिधियों की तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
सांसद जनार्दन मिश्रा के कड़े बोल: डॉक्टर भगवान या नोट छापने की मशीन?
रीवा के सांसद जनार्दन मिश्रा ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर खुला हमला बोला है। उन्होंने डॉक्टरों की कार्यशैली को आड़े हाथों लेते हुए तीखी टिप्पणी की:
सांसद ने कहा कि यदि उनका वश चले तो वे सभी लापरवाह डॉक्टरों के मेडिकल लाइसेंस तुरंत निरस्त करवा दें। उनका कहना था कि आज जनता डॉक्टरों को भगवान नहीं बल्कि ‘नोट छापने की मशीन’ या ‘दानव’ के रूप में देखने लगी है। सांसद ने स्पष्ट रूप से मांग की है कि डॉक्टरों को अपनी निजी प्रैक्टिस और सरकारी अस्पतालों की ड्यूटी के बीच संतुलन बनाना होगा, अन्यथा उन पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।
रीवा के वो 4 बड़े मामले जिन्होंने स्वास्थ्य विभाग की पोल खोल दी
सांसद का यह गुस्सा अचानक नहीं फूटा है, बल्कि रीवा में हाल ही में सामने आए चार बड़े मामलों ने प्रशासनिक व्यवस्था को हिलाकर रख दिया है:
जच्चा-बच्चा की मौत (गांधी मेमोरियल अस्पताल)
अगस्त 2026 में मनगवां निवासी कल्पना मिश्रा और उनके नवजात की प्रसव के दौरान गांधी मेमोरियल अस्पताल में मौत हो गई। परिजनों ने डॉक्टरों पर गंभीर लापरवाही और दुर्व्यवहार के आरोप लगाए, जिसके बाद दो डॉक्टर और दो नर्सिंग अधिकारियों को निलंबित किया गया तथा डीन व अधीक्षक को हटाया गया।
गर्भवती महिला और गर्भस्थ शिशु की मौत (संजय गांधी अस्पताल)
अक्टूबर 2025 में सतना से रेफर होकर आईं गर्भवती दीपा गुप्ता और उनके गर्भस्थ शिशु की संजय गांधी अस्पताल में मौत हो गई। परिजनों का आरोप था कि दो दिनों तक डॉक्टरों ने उनकी सुधि नहीं ली।
गलत ऑपरेशन की शिकायत और महिला का आत्मदाह प्रयास
सितंबर 2026 में हुजूर तहसील की मिथिलेश सिंह ने कलेक्टर से शिकायत की कि एक डॉक्टर ने उनके कंधे का गलत ऑपरेशन कर दिया है। एम्स जाने पर पता चला कि उनका कंधा पूरी तरह बिगड़ चुका है, जिससे त्रस्त होकर महिला ने किराए के कमरे में खुद को आग लगा ली।
20 मिनट में टीबी की 14 गोलियां देने का गंभीर आरोप
अक्टूबर 2026 में 21 वर्षीय अक्षत शुक्ला की इलाज के दौरान मौत हो गई। पिता सुभाष शुक्ला ने संजीवनी अस्पताल के डॉक्टरों पर आरोप लगाया कि महज 20 मिनट के भीतर उनके बेटे को टीबी की 14 गोलियां दे दी गईं, जिससे उसकी हालत बिगड़ गई और प्रार्थना अस्पताल में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। पुलिस इस मामले की गहन जांच कर रही है।
डिप्टी सीएम एवं स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ला के गढ़ में चुनौती
यह पूरा मामला इसलिए भी राजनीतिक रूप से संवेदनशील है क्योंकि मध्य प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ला खुद रीवा विधानसभा क्षेत्र से ही विधायक हैं। अपने ही गृह जिले और पार्टी के सांसद द्वारा स्वास्थ्य विभाग की इस तरह आलोचना किया जाना सरकार की जवाबदेही पर बड़े सवाल खड़े करता है। जनता अब यह सवाल पूछ रही है कि स्वास्थ्य मंत्री के अपने गढ़ में ऐसी लचर व्यवस्था क्यों है?
निजी प्रैक्टिस बनाम सरकारी जिम्मेदारी: समाधान क्या है?
विशेषज्ञों और जनप्रतिनिधियों का मानना है कि इस समस्या के समाधान के लिए निम्नलिखित कदम उठाने जरूरी हैं: सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की उपस्थिति बायोमीट्रिक और औचक निरीक्षण के जरिए सुनिश्चित की जाए। निजी प्रैक्टिस करने वाले डॉक्टरों पर कड़े नैतिक नियम लागू हों ताकि वे सरकारी मरीजों की अनदेखी न कर सकें। हर अस्पताल में एक त्वरित शिकायत निवारण सेल हो जहाँ मरीज या परिजन सीधे अपनी बात रख सकें। रीवा में स्वास्थ्य सेवाओं को पटरी पर लाने के लिए केवल बयानों तक सीमित रहने से काम नहीं चलेगा, बल्कि धरातल पर सख्त प्रशासनिक कार्रवाई की आवश्यकता है।


