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November 5, 2026 5:13 pm

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Rewa Food Safety Scam: सिर्फ छोटे ठेले वालों की दिवाली काली क्यों? जानिए रीवा के किन 5 बड़े सेठों की डेयरी में नहीं घुसते फूड इंस्पेक्टर!

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ऋतुराज द्विवेदी। मध्य प्रदेश के विंध्य अंचल के सबसे बड़े शहर रीवा में मिलावट खोरी का कारोबार इन दिनों चरम पर है। शहर के नागरिकों के स्वास्थ्य के साथ किस तरह खुलेआम खिलवाड़ किया जा रहा है, इसकी बानगी रीवा की गलियों से लेकर बड़े औद्योगिक इलाकों तक फैली हुई है। हैरानी की बात यह है कि खाद्य सुरक्षा और प्रशासन का चाबुक हमेशा सिर्फ उन छोटे दुकानदारों, ठेले वालों और गुमटी संचालकों पर चलता है जिनकी पहुंच ऊपर तक नहीं होती। इसके विपरीत, शहर के उन नामी-गिरामी रसूखदार कारोबारियों, बड़ी डेयरियों और विशाल मिष्ठान कारखानों पर आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, जिनकी यूनिट्स में संदिग्ध और अमानक सामग्री का उत्पादन धड़ल्ले से जारी है।

जनता के मन में अब यह सवाल सुलग रहा है कि आखिर इन रसूखदार खाद्य कारोबारियों को किसका संरक्षण प्राप्त है? क्यों खाद्य एवं औषधि प्रशासन के अधिकारी केवल कागजी खानापूर्ति करने के लिए सैंपल लेते हैं और फिर फाइलें ठंडे बस्ते में चली जाती हैं? आइए रीवा शहर के उन बड़े ठिकानों और कारखानों की जमीनी हकीकत को टटोलते हैं, जिन पर आज तक प्रशासनिक नजरें इनायत बनी हुई हैं।

जय डेयरी: मैदानी में चल रहे बड़े कारखाने रीवा शहर में दूध, पनीर और डेयरी प्रोडक्ट्स की आपूर्ति में कुछ बड़े नाम सबसे आगे हैं। मुख्य गोदाम और उत्पादन इकाई मैदानी क्षेत्र में संचालित होती है। शहर भर में सप्लाई होने वाले डेयरी उत्पादों की गुणवत्ता को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन यहां तक प्रशासनिक अमले की हिम्मत जांच के लिए कम ही पहुंचती है।

बंगाल स्वीट्स और गोप स्वीट्स की हकीकत: शहर भर में फैली दुकानें और तरहटी का गोदाम
रीवा के खानपान बाजार में बंगाली मिठाइयों और पारंपरिक व्यंजनों के लिए मशहूर प्रतिष्ठानों के साम्राज्य दूर-दूर तक फैले हैं। इसका मुख्य ठिकाना और निर्माण इकाई अमहिया गल्ला मंडी के पास नाले के किनारे स्थित है। इस इलाके की भौगोलिक स्थिति और साफ-सफाई के मानकों पर स्थानीय लोगों ने कई बार दबी जुबान से सवाल उठाए हैं, बावजूद इसके विभागीय अधिकारी इस क्षेत्र का औचक निरीक्षण करने से कतराते हैं।

गोप स्वीट्स: शहर के अलग-अलग हिस्सों में लगभग आधा दर्जन से अधिक शाखाएं संचालित करने वाले गोप स्वीट्स का मुख्य कारखाना ताराहाटी क्षेत्र में है। शहर के सबसे व्यस्त इलाकों में इन दुकानों के जरिए रोजाना हजारों ग्राहक मिठाइयां खरीदते हैं, लेकिन इनके कारखानों की साफ-सफाई और उपयोग होने वाले कच्चे माल की शुद्धता की सुस्पष्ट जांच रिपोर्ट कभी सार्वजनिक नहीं की जाती।

शिवम स्वीट्स और छप्पन भोग: न्यू बस स्टैंड से लेकर दीप कॉम्प्लेक्स तक मिलावट के अखाड़े
शहर के ट्रांजिट पॉइंट्स और प्रीमियम कमर्शियल हब में स्थित इन दुकानों का रसूख किसी से छिपा नहीं है। न्यू बस स्टैंड के पास इलाहाबाद रोड पर स्थित इस प्रसिद्ध प्रतिष्ठान का बड़ा गोदाम इंदिरा नगर क्षेत्र में बना हुआ है। बस स्टैंड जैसे अत्यधिक भीड़भाड़ वाले इलाके में जहां रोज हजारों यात्री भोजन और मिठाइयां खरीदते हैं, वहां खाद्य सुरक्षा के मानकों की नियमित मॉनिटरिंग न होना एक बड़ी लापरवाही है। शहर के पाश इलाके में शुमार दीप कॉम्प्लेक्स (स्टेट बैंक के सामने) में इसका मुख्य कारखाना और आउटलेट संचालित होता है। शहर के रसूखदार और वीआईपी लोग यहां खरीदारी करते हैं, जिसके चलते विभाग के अधिकारी इन तक पहुंचने से पहले ही नतमस्तक नजर आते हैं।

अशोक मिष्ठान और कामधेनु डेयरी: शहर के कोने-कोने में जाल, पर फूड सेफ्टी विभाग मौन

कामधेनु डेयरी: रीवा शहर में कामधेनु डेयरी का नेटवर्क हर चौराहे पर फैला हुआ है। समान तिराहा, ढेकाहा, गुढ़ चौराहा और शहर के अन्य प्रमुख चौराहों पर इसकी शाखाएं मौजूद हैं। जब डेयरी का विस्तार इतना व्यापक हो और उत्पादन बड़े पैमाने पर हो, तो मिलावट की आशंकाएं भी उतनी ही बढ़ जाती हैं। इसके बावजूद प्रशासनिक अमला केवल इक्का-दुक्का जगहों पर औपचारिकता निभाकर शांत बैठ जाता है।

अशोक मिष्ठान: रीवा के पुराने और प्रतिष्ठित मिष्ठान भंडारों में गिने जाने वाले इस प्रतिष्ठान की गुणवत्ता पर भी समय-समय पर शहरवासियों ने चर्चा की है, लेकिन विभागीय संरक्षण के कारण इन पर कभी बड़ी कार्रवाई होते नहीं देखी गई।

सिर्फ छोटे दुकानदारों पर चाबुक क्यों? रसूखदार मिलावटखोरों पर मेहरबान प्रशासन
रीवा जिले में खाद्य विभाग (Food Department) की कार्य शैली हमेशा से कटघरे में रही है। जब भी त्योहारों का सीजन आता है (जैसे दीपावली, होली या रक्षाबंधन), विभाग की टीम हरकत में आती है। लेकिन उनकी कार्रवाई का पैटर्न बेहद पक्षपातपूर्ण होता है,सड़क किनारे ठेला लगाने वाले चाट विक्रेता, छोटे हलवाई, किराना स्टोर चलाने वाले सामान्य व्यापारी या गाँव से दूध बेचने आने वाले छोटे ग्वालों को तुरंत निशाना बनाया जाता है। उनके मामूली सैंपल भरकर उन पर भारी जुर्माने की कार्रवाई कर दी जाती है या उनकी दुकानें सील करने का डर दिखाया जाता है।

इसके विपरीत, जिन बड़े कारोबारियों (जय डेयरी, कामधेनु, छप्पन भोग आदि) के पास राजनीतिक और आर्थिक रसूख है, उनके यहां विभाग के अधिकारी जाने से डरते हैं। यदि कभी दबाव में सैंपल ले भी लिए जाते हैं, तो वे फाइलें भोपाल या रीवा की लैब में महीनों और सालों तक धूल फांकती रहती हैं।

सैंपल जांच के नाम पर लीपापोती: आज तक किसी रिपोर्ट का खुलासा क्यों नहीं हुआ?
रीवा की जनता का सबसे बड़ा और वाजिब सवाल यह है कि आखिर पिछले कुछ वर्षों में जितने भी खाद्य सैंपल शहर के इन बड़े प्रतिष्ठानों से भरे गए, उनमें से कितने फेल हुए? विभाग द्वारा यह दावा तो किया जाता है कि हमने त्योहारी सीजन में 50 या 100 सैंपल लिए और उन्हें जांच के लिए भोपाल की स्टेट फूड टेस्टिंग लैब भेजा गया है। लेकिन इसके बाद उन रिपोर्ट्स का क्या हुआ?

कितने व्यापारियों पर खाद्य सुरक्षा मानक अधिनियम के तहत अदालत में प्रकरण दर्ज किए गए? कितनों पर भारी आर्थिक जुर्माना लगाया गया? इन सवालों के जवाब कभी सार्वजनिक नहीं किए जाते। जानकारों का मानना है कि सैंपल लेने के बाद प्रयोगशाला से सेटिंग कर ली जाती है या रिपोर्ट को ‘अमानक’ के बजाय ‘मानक’ घोषित करवा दिया जाता है, या फिर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। यही वजह है कि रीवा में मिलावटखोरों के हौसले बुलंद हैं और उन्हें कानून का कोई डर नहीं है।

जनता के स्वास्थ्य से खिलवाड़: खाद्य सुरक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल
रीवा के आम नागरिक शुद्ध दूध, शुद्ध घी, मावा और मिठाइयों के नाम पर अपनी गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा खर्च कर रहे हैं, बदले में उन्हें मिलावटी और केमिकल्स से बने उत्पाद मिल रहे हैं। यूरिया, डिटर्जेंट, पाम ऑयल, और सिंथेटिक रंगों से तैयार होने वाली मिठाइयां और डेयरी उत्पाद लोगों को गंभीर बीमारियों (जैसे कैंसर, किडनी और लीवर फेलियर) की तरफ धकेल रहे हैं।

यदि समय रहते रीवा जिला प्रशासन, कलेक्टर और खाद्य सुरक्षा आयुक्त ने इन रसूखदार डेयरियों और मिष्ठान कारखानों (जय डेयरी, कामधेनु, छप्पन भोग आदि) की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच नहीं कराई, तो आने वाले समय में जनता का स्वास्थ्य पूरी तरह से दांव पर लग जाएगा। प्रशासन बिना किसी दबाव के पारदर्शिता बरते और सभी लंबित सैंपल जांचों की रिपोर्ट सार्वजनिक करते हुए कड़ी दंडात्मक कार्रवाई करे।

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