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November 5, 2026 9:22 pm

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रीवा में घनी आबादी के बीच बारूद का खेल: क्या एक बोरा पटाखा और ‘ले-देकर’ बिक गई मासूमों की सुरक्षा? लाखों के अवैध पटाखे, कलेक्टर के आदेश हवा में

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ऋतुराज द्विवेदी। मध्य प्रदेश के रीवा शहर में त्योहारी सीजन आते ही प्रशासनिक तंत्र की साख पर बड़े और गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। एक तरफ जहां जिला प्रशासन और कलेक्ट्रेट की ओर से यह दावा किया जाता है कि शहर के भीतर सुरक्षा मानकों को ताक पर रखकर कोई भी अवैध गतिविधि संचालित नहीं होने दी जाएगी, वहीं जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल विपरीत है। घनी आबादी वाले रिहायशी इलाकों में नियमों को ठेंगा दिखाकर लाखों रुपए के बारूद और पटाखों का अवैध भंडारण धड़ल्ले से जारी है।

जब ऐसे मामलों में प्रशासनिक टीमें औपचारिकता निभाने के लिए रात के अंधेरे में दबिश देती हैं और बिना किसी ठोस कार्रवाई के वापस लौट आती हैं, तो जनता के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या रीवा में कानून से ऊपर कुछ खास लोग हैं जिन्हें किसी बड़े अधिकारी का सीधा संरक्षण प्राप्त है?

कलेक्टर के निरस्त लाइसेंस के बावजूद कैसे चल रहा बारूद का अवैध कारोबार?
रीवा जिला प्रशासन और जिला कलेक्टर के स्पष्ट निर्देश और पूर्व में जारी आदेशों के अनुसार, सुरक्षा मानकों का पालन न करने वाले तथा घनी बस्तियों के बीच संचालित होने वाले पटाखा दुकानों व गोदामों के लाइसेंस तत्काल प्रभाव से निरस्त किए जा चुके हैं। इसके बावजूद हैरान करने वाली बात यह है कि शहर के कई हिस्सों में धड़ल्ले से अवैध पटाखों की खरीद-फरोख्त जारी है।

रिहायशी मकान में मिला लाखों के पटाखों का भंडारण।

सवाल यह उठता है कि जब जिला प्रशासन ने लाइसेंस निरस्त कर दिए हैं, तो फिर शहर के भीतर इन गोदामों और दुकानों का संचालन किसकी शह पर हो रहा है? क्या जिला मुख्यालय के अधिकारी कागजों पर कार्रवाई का नाटक कर रहे हैं और अंदरखाने अवैध कारोबारियों को खुली छूट दी जा रही है? यह स्थिति प्रशासनिक व्यवस्था पर एक बदनुमा दाग है जो सिस्टम की पारदर्शिता की पोल खोलती है।

दीपू भाई पटाखा वाले के यहां आधी रात की ‘दबिश’ और कार्रवाई के नाम पर खानापूर्ति
इस पूरे प्रशासनिक खेल की कलई तब खुली जब बुधवार की देर रात प्रशासनिक अमला और स्थानीय पुलिस टीम शहर के मैदानी इलाके में स्थित ‘दीपू भाई पटाखा वाले’ की दुकान और उससे जुड़े रिहायशी मकान पर अचानक दबिश देने पहुँची। टीम ने जब अंदर प्रवेश किया तो उनकी आँखें फटी रह गई। एक सामान्य आवासीय मकान के कमरों और परिसरों में लाखों रुपए के विस्फोटक पटाखे ठूँस-ठूँसकर भरे हुए पाए गए।

रिहायशी इलाकों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल: क्या एक बोरी पटाखे में बिक गई मासूमों की जान?
“जब वह पूरी तरह से घना रिहायशी इलाका है, तो आखिर वहां पटाखों के भंडारण की अनुमति मिली कैसे? अगर कल को कोई बड़ा हादसा हो जाता है, भीषण आग लग जाती है और कई मासूमों की जान चली जाती है, तो उस मौत का जिम्मेदार कौन होगा? आसपास के मकानों में रहने वाले उन मासूम बच्चों और परिवारों का क्या होगा? क्या प्रशासन ने उनके बारे में, उनकी सुरक्षा के बारे में कुछ भी नहीं सोचा—या फिर अधिकारियों ने महज एक बोरा पटाखा और ले-देकर सब कुछ सेट कर लिया और जनता की जान की कोई कीमत ही नहीं बची?” यह सवाल आज रीवा का हर नागरिक जिम्मेदार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से पूछ रहा है।

नियमों के मुताबिक यह एक गंभीर आपराधिक कृत्य था, जिस पर तुरंत भारी जब्ती, गोदाम सीलिंग और एफआईआर दर्ज की जानी चाहिए थी। लेकिन इसके विपरीत, प्रशासनिक टीम ने मौके पर महज औपचारिकता निभाई, लंबी-चौड़ी बातें कीं और बिना किसी ठोस कार्रवाई के बैरंग वापस लौट गई। इतनी भारी मात्रा में विस्फोटक मिलने के बाद भी यदि कार्रवाई शून्य रही, तो यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि दाल में कुछ काला नहीं बल्कि पूरी दाल ही काली है।

“एक बोरा पटाखा मिला और मामला रफा-दफा”: क्या बिक चुका है स्थानीय प्रशासन?
रीवा की जनता और स्थानीय नागरिकों के बीच अब यह चर्चा आम हो गई है कि क्या प्रशासनिक अधिकारियों और स्थानीय पटाखा माफियाओं के बीच कोई गुप्त सौदा हो चुका है? सूत्र बताते हैं कि जब भी इस तरह के अवैध अड्डों पर छापे पड़ते हैं, तो सांठगांठ के खेल के तहत मामला ‘ले-देकर’ रफा-दफा कर दिया जाता है।

क्या अधिकारियों को ‘एक बोरा पटाखा’ या मोटी रकम पहुँचाकर आँखें मूंदने का खेल खेला जा रहा है? जिस तरह से घनी बस्तियों में लाखों का बारूद मिलने के बावजूद अधिकारी आँखें फेर लेते हैं, उससे यह संदेह सौ फीसदी पुख्ता हो जाता है कि प्रशासनिक सुस्ती के पीछे भ्रष्टाचार और मिलीभगत का एक बड़ा जाल काम कर रहा है। जब जिम्मेदार लोग ही रिश्वत या दबाव के आगे झुक जाएंगे, तो आम जनता की सुरक्षा की गारंटी कौन लेगा?

नियम 82 और विस्फोटक अधिनियम की धज्जियां: घनी आबादी में मौत का गोदाम
विस्फोटक अधिनियम (Explosives Act) के नियम 82 में यह बेहद कड़े और स्पष्ट प्रावधान किए गए हैं कि किसी भी स्थिति में पटाखों का गोदाम शहर की घनी आबादी, रिहायशी मकानों या मुख्य बाजारों के बीच नहीं हो सकता। गोदाम के लिए शहर से बाहर एक अलग और सुरक्षित स्थान पर लाइसेंस लेना अनिवार्य होता है, जहाँ अधिकतम 5 हजार किलोग्राम (5,000 Kg) तक का ही सुरक्षित भंडारण किया जा सके।

दीपावली से पहले घनी आबादी के बीच पटाखों का भंडारण सुरक्षा के लिए खतरा।

इसके अलावा, उस गोदाम से सीधे खुदरा या थोक बिक्री करने पर भी पूरी तरह पाबंदी होती है। इसके विपरीत, रीवा के रिहायशी मकानों में जहाँ चारों तरफ आम जनता, बच्चे और महिलाएँ रहती हैं, वहाँ इस प्रकार लाखों का बारूद जमा करना सीधे तौर पर सैकड़ों बेकसूर लोगों की जान को दांव पर लगाना है। यदि यहाँ कोई छोटी सी चिंगारी भी सुलग उठी, तो पूरा मोहल्ला चंद सेकंडों में श्मशान में बदल सकता है, लेकिन प्रशासन को शायद किसी बड़े हादसे का इंतजार है।

जनता की सुरक्षा दांव पर: अधिवक्ता बीके माला और नागरिकों का तीखा रोष
इस लचर और संदेहास्पद प्रशासनिक कार्रवाई पर रीवा के प्रबुद्ध वर्ग ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। जाने-माने अधिवक्ता बीके माला ने इस घटना की कड़ी निंदा करते हुए इसे नागरिकों के जीवन के साथ खिलवाड़ करार दिया है। उनका साफ कहना है कि यदि निरीक्षण के दौरान रिहायशी मकान में अवैध रूप से भारी मात्रा में पटाखे मिल चुके थे, तो प्रशासन ने किस नियम के तहत उन्हें बिना जब्त किए और बिना मामला दर्ज किए छोड़ दिया?

सिर्फ दिखावे के लिए दबिश देकर लौट आना समस्या का समाधान नहीं है, बल्कि यह मिलीभगत का जीता-जागता सबूत है। शहर के दूसरे रिहायशी इलाकों में भी इस तरह के अवैध गोदाम धड़ल्ले से चल रहे हैं, जिन पर कोई गाज नहीं गिर रही है।

क्या रीवा में नियमों से ऊपर बिकता है बारूद और भ्रष्टाचार?
रीवा में दीपू भाई पटाखा वाले के यहां हुई यह घटना इस बात का प्रमाण है कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति और ईमानदारी अब कागजों तक सीमित रह गई है। जब तक भ्रष्ट अधिकारियों और अवैध पटाखा कारोबारियों के इस नेक्सेस (Nexus) को तोड़ा नहीं जाएगा, तब तक रीवा की जनता यूं ही खतरे के साए में जीने को मजबूर रहेगी। अब देखना यह होगा कि क्या उच्चाधिकारी इस मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए लिप्त अधिकारियों और अवैध कारोबारियों पर कठोर कार्रवाई करते हैं या फिर हर बार की तरह मामले को लीपापोती कर दबा दिया जाता है।

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