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November 7, 2026 11:09 pm

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रीवा ट्रैफिक पुलिस का ‘VIP तमाशा’: कागजों पर बना सुपर प्लान, सड़कों पर सुबेदार और टीआई की ‘गाड़ी वाली ड्यूटी’ पड़ी भारी!

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ऋतुराज द्विवेदी (राज्य ब्यूरो) दीपावली का पावन पर्व नजदीक आते ही रीवा शहर के बाजारों में रौनक और खरीदारों की भीड़ अपने चरम पर पहुंच गई है। अमहिया, कॉलेज चौराहा, जय स्तंभ, ढेकहा चौराहा और बस स्टैंड जैसे प्रमुख और व्यस्त इलाकों में इन दिनों पैर रखने की भी जगह नहीं बची है। सुबह से लेकर देर रात तक सड़कों पर खरीदारों का सैलाब उमड़ रहा है, जिसके चलते शहर की यातायात व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई है। लोग अपनी जरूरत का सामान खरीदने के लिए बाजारों का रुख तो कर रहे हैं, लेकिन सड़कों पर लगते भीषण जाम के कारण उनका यह सफर किसी आफत से कम साबित नहीं हो रहा है।

सड़कें वाहनों की लंबी-लंबी कतारों सेटी हुई नजर आ रही हैं। दोपहिया वाहनों से लेकर चार पहिया वाहन तक घंटों इस ट्रैफिक के मकड़जाल में फंसे रहते हैं। स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि लगातार दूसरे दिन भी शहर के प्रमुख मार्गों पर जाम का यही मंजर देखने को मिला। त्यौहार के समय बाजार में भारी भीड़ उमड़ने का अनुमान प्रशासन और यातायात विभाग को पहले से ही था, इसके बावजूद सड़कों पर वाहनों के बढ़ते दबाव को नियंत्रित करने के लिए कोई भी प्रभावी और ठोस कदम मौके पर नजर नहीं आए।

कागजी दावे बनाम रीवा की जमीनी हकीकत
त्योहारी सीजन को ध्यान में रखते हुए पुलिस विभाग और यातायात थाने की तरफ से बड़े-बड़े दावे किए गए थे कि इस बार शहर में ट्रैफिक व्यवस्था दुरुस्त रहेगी। पुलिस ने सुचारू यातायात के लिए विशेष ट्रैफिक प्लान तैयार करने की बात कही थी, जिसके तहत चुनिंदा जगहों पर बैरिकेडिंग की गई और कुछ खास मार्गों पर ऑटो तथा ई-रिक्शा के प्रवेश पर पूरी तरह से रोक लगाने के निर्देश दिए गए थे। हालांकि, इन तमाम कागजी और जुबानी दावों की पोल शुक्रवार को रीवा की सड़कों पर साफ खुल गई।

बैरिकेडिंग के बावजूद हालात सुधरने का नाम नहीं ले रहे हैं। जिन रास्तों पर ऑटो और ई-रिक्शा के प्रतिबंध के दावे किए जा रहे थे, उन्हीं रास्तों पर नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। मैदानी अमले की सुस्ती और लचर निगरानी के कारण ट्रैफिक प्लान पूरी तरह से कागजी साबित हो रहा है। प्रशासन के तमाम वादे और दावे केवल फाइलों तक सीमित रहकर रह गए हैं, जबकि आम जनता सड़क पर उतरकर रोजाना इस बदइंतजामी का खामियाजा भुगतने को मजबूर है।

ट्रैफिक थाना प्रभारी अनीमा शर्मा और सुबेदार अंजलि गुप्ता की कार्यशैली पर गंभीर सवाल
रीवा की इस बदतर यातायात व्यवस्था को लेकर अब पुलिस अधिकारियों की कार्यशैली पर सीधे और गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। ट्रैफिक थाना प्रभारी अनीमा शर्मा द्वारा भले ही यह बयान दिया जा रहा हो कि पुलिस बल तैनात है और लगातार निगरानी रखी जा रही है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। खासकर सुबेदार अंजलि गुप्ता और ट्रैफिक थाने की कार्यप्रणाली को लेकर जनता और जागरूक नागरिकों में भारी आक्रोश देखा जा रहा है।

आरोप है कि जिम्मेदार अधिकारी सड़कों पर उतरकर मेहनत करने के बजाय सिर्फ अपनी सरकारी गाड़ियों यानी बोलेरो में बैठकर दूर से ही आदेश और निर्देश जारी करने तक सीमित हैं। चाहे आम दिन हों या फिर दीपावली जैसा बड़ा त्यौहार, शहर के ट्रैफिक हालात में किसी भी प्रकार का कोई सकारात्मक सुधार देखने को नहीं मिल रहा है। जब तक अधिकारी और जिम्मेदार सुबेदार एसी गाड़ियों में बैठकर आदेश देते रहेंगे और खुद सड़कों पर उतरकर पब्लिक के बीच खड़े होकर ट्रैफिक नहीं संभालेंगे, तब तक इस व्यवस्था का सुधरना नामुमकिन है।

बोलेरो गाड़ी में बैठकर आदेश देने की संस्कृति और बिगड़ी व्यवस्था
रीवा की यातायात व्यवस्था के चौपट होने का सबसे बड़ा कारण अधिकारियों का एसी कमरों और बोलेरो गाड़ियों तक सीमित रहना बन गया है। जब शहर के चौराहे वाहनों की बेतरतीब पार्किंग, बेलगाम ऑटो और ई-रिक्शा की मनमानी से पूरी तरह जाम हो जाते हैं, तब भी पुलिस कर्मी या जिम्मेदार अधिकारी मौके पर पब्लिक के बीच जाकर खड़े होने की जहमत नहीं उठाते। केवल गाड़ी में बैठे-बैट वॉकटॉकी से दिशा-निर्देश देने से रीवा का ट्रैफिक सुधरने वाला नहीं है।

जिम्मेदारी से अपनी ड्यूटी निभाने का मतलब सिर्फ खानापूर्ति करना नहीं होता है। जब तक पुलिस बल और वरिष्ठ अधिकारी सड़क पर उतरकर खुद मोर्चा नहीं संभालेंगे, तब तक लोग जाम की इस समस्या से जूझते रहेंगे। आज आलम यह है कि हमारी पूरी यातायात व्यवस्था पूरी तरह से बर्बाद हो चुकी है और इस पर किसी का कोई वास्तविक नियंत्रण नजर नहीं आ रहा है। त्योहार के इस पावन मौके पर जब लोगों को सहूलियत मिलनी चाहिए थी, तब उन्हें सड़कों पर घंटों जूझना पड़ रहा है।

आम जनता और समाजसेवियों का फूटा गुस्सा
जाम के इस नरक में फंसकर आम जनता का धैर्य अब जवाब देने लगा है। जरूरी कामों से घर से बाहर निकले नागरिकों का कहना है कि रीवा में अब एक जगह से दूसरी जगह जाना भी किसी जंग जीतने जैसा हो गया है। सुरेश पटेल नामक स्थानीय नागरिक ने दर्द बयां करते हुए कहा कि शहर के मुख्य रास्तों पर निकलना दूभर हो गया है और बहुमूल्य समय सिर्फ सड़क पर जाम खुलवाने के इंतजार में बर्बाद हो जाता है। त्योहारों के वक्त तो यातायात व्यवस्था को और अधिक मुस्तैद होना चाहिए, लेकिन धरातल पर शून्य इंतजाम दिखाई देते हैं।

वहीं, पियूष पांडेय बेला निवासी ने तीखा तंज कसते हुए कहा कि आपातकालीन या जरूरी काम से जाने वाले लोगों को भी इस जाम के कारण भारी फजीहत उठानी पड़ती है। भीड़भाड़ के इस समय में ट्रैफिक को संभालना पूरी तरह ट्रैफिक पुलिस की नैतिक और पेशेवर जिम्मेदारी है, लेकिन सड़कों पर पुलिस नदारद दिखती है। इसके अलावा, समाजसेवी शिवानंद द्विवेदी ने भी रीवा की यातायात व्यवस्था पर कड़े सवाल उठाए हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि हर बड़े त्यौहार पर शहर में ट्रैफिक का दबाव बढ़ता है, यह बात प्रशासन को पता होती है, फिर भी हर बार जनता को जाम का सामना करना पड़ता है। पुलिस को सिर्फ प्लान बनाने और मीडिया को बयान देने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसका असर सड़कों पर दिखना चाहिए। जनता को खोखले दावों और बैरिकेडिंग से नहीं, बल्कि जाम से स्थाई राहत मिलने पर ही किसी व्यवस्था का फायदा मिल सकता है।

रीवा यातायात व्यवस्था सुधारने के लिए जरूरी और ठोस कदम
अधिकारियों को अपनी सरकारी बोलेरो गाड़ियों से बाहर निकलकर चौराहों पर खुद खड़े होकर ट्रैफिक संचालन की कमान संभालनी होगी। बाजारों और मुख्य मार्गों के दोनों ओर बेतरतीब ढंग से खड़े होने वाले वाहनों और ऑटो-ई-रिक्शा पर भारी जुर्माना लगाया जाए। सड़क किनारे दुकान लगाने वालों और ठेले वालों को व्यवस्थित किया जाए ताकि पैदल चलने वालों के लिए रास्ता सुलभ हो सके। ट्रैफिक पुलिस को स्थानीय दुकानदारों और स्वयंसेवकों का सहयोग लेकर भीड़भाड़ वाले इलाकों में वन-वे ट्रैफिक व्यवस्था लागू करनी चाहिए।

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