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November 8, 2026 11:03 pm

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रतहरा पुलिया घोटाला: PWD में हड़कंप! 15 दिन पुरानी सड़क ढहने पर सीएम हाउस तक गूंजी गूंज, इंजीनियरों पर गिरेगी गाज?

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ऋतुराज द्विवेदी (राज्य ब्यूरो)
मध्य प्रदेश के रीवा जिले में लोक निर्माण विभाग (PWD) की कार्यप्रणाली एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। शहर के रतहरा क्षेत्र में एक ऐसा वाकया सामने आया है जिसने प्रशासनिक तंत्र और इंजीनियरिंग के दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं। यहाँ महज 15 दिन पहले ही जिस पुलिया का निर्माण पूरी भव्यता के साथ किया गया था, उसे अचानक दोबारा तोड़ने का काम शुरू कर दिया गया है। जनता के टैक्स के पैसों से बने इस ढांचे को चंद दिनों के भीतर नेस्तनाबूद होते देख स्थानीय लोग हैरान और आक्रोशित हैं। आखिर ऐसे क्या हालात बने कि पखवाड़े भर पहले बनी पुलिया को हथौड़े और जेसीबी से तोड़ना पड़ रहा है? यह सवाल आज हर रीवावासी की जुबान पर है।

रतहरा पुलिया मामला: क्या है पूरा घटनाक्रम?
घटना रीवा के व्यस्त और महत्वपूर्ण रतहरा क्षेत्र की है। यहाँ कुछ हफ्ते पहले ही आवागमन को सुगम बनाने के उद्देश्य से एक पुलिया का निर्माण कार्य पूरा किया गया था। निर्माण पूरा होने के बाद स्थानीय लोगों को उम्मीद थी कि अब उन्हें खराब रास्तों से राहत मिलेगी। लेकिन लोगों की यह खुशी महज 15 दिनों तक ही टिक पाई। अचानक मजदूरों और मशीनों को लाकर उस नई-नवेली पुलिया को तोड़ना शुरू कर दिया गया। किसी भी तकनीकी या आपदा संबंधी बड़ी चेतावनी के बिना इस प्रकार रातों-रात पुलिया तोड़े जाने से इलाके में तरह-तरह की चर्चाएं गर्म हैं और यह मामला अब सोशल मीडिया से लेकर आम चौपालों तक चर्चा का विषय बन गया है।

PWD की कार्यप्रणाली और तकनीकी मानकों पर सवाल
इस पूरी घटना ने लोक निर्माण विभाग (PWD) की इंजीनियरिंग और कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। सवाल यह उठता है कि क्या निर्माण से पहले किसी प्रकार का सॉइल टेस्ट या डिजाइन अप्रूवल नहीं लिया गया था? यदि तकनीकी मानक सही थे, तो 15 दिन के भीतर उसमें ऐसी कौन सी बड़ी खामी आ गई कि उसे गिराना पड़ रहा है? जानकारों का मानना है कि यह या तो घटिया सामग्री के इस्तेमाल का परिणाम है या फिर बिना किसी ठोस प्लानिंग के किए गए कार्य का नतीजा। विभाग की इस लाचारी से यह साफ जाहिर होता है कि जमीनी स्तर पर निगरानी करने वाला कोई नहीं है।

कार्यपालन यंत्री नितिन पटेल की भूमिका और जवाबदेही
इस पूरे प्रोजेक्ट और क्षेत्र की देखरेख की जिम्मेदारी सीधे तौर पर लोक निर्माण विभाग के कार्यपालन यंत्री नितिन पटेल के कंधों पर है। जनता और स्थानीय प्रबुद्ध नागरिकों का कहना है कि जब इस तरह के निर्माण कार्य कराए जाते हैं, तो संबंधित अधिकारियों का यह दायित्व बनता है कि वे गुणवत्ता की मानिटरिंग करें। महज 15 दिन में पुलिया टूटने की नौबत आने का मतलब है कि विभागीय स्तर पर या तो निरीक्षण में भारी चूक हुई है या फिर मिलीभगत के तहत काम को खानापूर्ति के रूप में पूरा किया गया था। ऐसे में श्री नितिन पटेल की जवाबदेही तय होना बेहद जरूरी है।

जनता के पैसे की बर्बादी और सरकारी नुकसान
यह मामला केवल एक पुलिया के टूटने का नहीं है, बल्कि यह आम जनता के गाढ़ी कमाई के टैक्स के पैसों की बेरहमी से बर्बादी का है। सरकार विकास कार्यों के नाम पर करोड़ों रुपए का बजट आवंटित करती है, लेकिन यदि एक ही काम को बार-बार तोड़ा और बनाया जाएगा, तो राजकोष पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा। पहले निर्माण पर लाखों रुपए खर्च हुए और अब उसे तोड़ने तथा दोबारा बनाने में फिर से जनता का पैसा पानी की तरह बहेगा। इस प्रकार के वित्तीय अपव्यय के लिए आखिरकार कौन जिम्मेदार है और इस नुकसान की भरपाई किसकी जेब से होगी?

5 तीखे सवाल जो प्रशासन से पूछे जाने चाहिए
इस पूरे प्रकरण को लेकर रीवा के जागरूक नागरिकों और विभिन्न संगठनों द्वारा प्रशासन से 5 सीधे सवाल पूछे जा रहे हैं: 15 दिन पहले बनी पुलिया को अचानक दोबारा तोड़ने का स्पष्ट और तकनीकी कारण क्या है? निर्माण कार्य पूरा होने के बाद इसकी गुणवत्ता (Quality Control) का सत्यापन किस जिम्मेदार अधिकारी द्वारा किया गया था? क्या इस घटिया और असफल निर्माण के लिए संबंधित ठेकेदार को पहले ही भुगतान किया जा चुका है या रोक लगाई गई है? पुलिया को तोड़ने और दोबारा नए सिरे से निर्माण कराने में होने वाले अतिरिक्त वित्तीय खर्च की जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या इस मामले में संलिप्त अधिकारियों और निर्माण एजेंसी पर कोई सख्त प्रशासनिक या विभागीय कार्रवाई की जाएगी?

रीवा के वरिष्ठ नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम जनता ने जिला प्रशासन से यह पुरजोर माँग की है कि रतहरा में हुए इस संपूर्ण खेल की एक उच्चस्तरीय और निष्पक्ष तकनीकी जांच कराई जाए। स्वतंत्र इंजीनियरों की एक टीम गठित कर यह पता लगाया जाए कि इस नाकामी के पीछे कौन लोग जिम्मेदार हैं। यदि इस मामले में लीपापोती की गई, तो जनता उग्र आंदोलन करने के लिए विवश होगी। सरकारी धन की इस तरह की लूट और लापरवाही को अब और बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।

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