मध्य प्रदेश के विंध्य संभाग के सबसे बड़े चिकित्सा केंद्र रीवा के संजय गांधी स्मृति चिकित्सालय में हुई एक गंभीर चिकित्सकीय लापरवाही से जुड़ी घटना लगातार तूल पकड़ती जा रही है। अस्पताल की व्यवस्थाओं और प्रशासनिक सुस्ती के खिलाफ एक बेबस पिता का संघर्ष अब न्याय की एक बड़ी लड़ाई का रूप ले चुका है। कल्पना मिश्रा और उनके नवजात शिशु की अकाल मृत्यु के बाद से शुरू हुआ यह विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है।

पीड़ित परिवार लगातार सिस्टम के ढीले रवैये और कागजी खानापूर्ति के खिलाफ संघर्ष कर रहा है। ताजा मामला जांच रिपोर्ट की प्रति उपलब्ध कराने को लेकर है, जिसके लिए मृतका के पिता को एक बार फिर सड़कों और कलेक्ट्रेट परिसर का रुख करना पड़ा है। इस संवेदनशील मामले ने एक बार फिर सरकारी अस्पतालों की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
संजय गांधी अस्पताल मामला और न्याय की गुहार
विंध्य अंचल के रीवा स्थित संजय गांधी स्मृति चिकित्सालय में इलाज के दौरान प्रसूता कल्पना मिश्रा और उनके नवजात शिशु की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। इस दुर्दैवपूर्ण घटना ने पूरे परिवार को झकझोर कर रख दिया था। परिवार का आरोप था कि अस्पताल के भीतर समय पर सही इलाज न मिलने और चिकित्सकीय अमले की गंभीर लापरवाही के कारण उनकी बेटी और नाती की जान चली गई।
इस घटना के सामने आने के बाद से ही इलाके में शोक और आक्रोश का माहौल बन गया था। मृतका के पिता रामशिरोमणि मिश्रा ने अपनी बेटी और मासूम बच्चे की मौत के लिए जिम्मेदार लोगों को सजा दिलाने और सच्चाई सामने लाने के लिए लंबी कानूनी और सामाजिक लड़ाई लड़ने का संकल्प लिया। अस्पताल प्रबंधन और स्थानीय प्रशासन की शुरुआती उदासीनता के चलते यह मामला और अधिक गंभीर होता चला गया, जिसके बाद आमजन का समर्थन भी पीड़ित परिवार के साथ जुड़ता गया।
मजिस्ट्रियल जांच और रिपोर्ट न मिलने का विवाद
न्याय की मांग को लेकर जब दबाव बढ़ा, तो प्रशासन हरकत में आया। मृतका के पिता रामशिरोमणि मिश्रा ने सितंबर के महीने में लगातार 15 दिनों तक कड़ाके की धूप और ठंड की परवाह किए बिना आमरण अनशन किया था। उनके इस लंबे संघर्ष के बाद जिला प्रशासन की नींद खुली और मामले की गंभीरता को देखते हुए स्वतंत्र मजिस्ट्रियल जांच के आदेश जारी किए गए।
प्रशासन द्वारा 4 सितंबर को जारी किए गए आदेश के तहत तत्कालीन सिरमौर एसडीएम को इस पूरे मामले की जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। नियमानुसार उन्हें 30 दिनों के भीतर अपनी विस्तृत जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करनी थी। रिपोर्ट तो तय समयसीमा के भीतर तैयार होकर जमा भी हो गई, लेकिन असली विवाद तब शुरू हुआ जब पीड़ित पिता को उस रिपोर्ट की अधिकृत प्रति (कॉपी) देने से प्रशासनिक अधिकारी आनाकानी करने लगे। रिपोर्ट को सार्वजनिक या पीड़ित परिवार को सौंपने में हो रही इस टालमटोल ने कई तरह के संदेहों को जन्म दे दिया है।
कलेक्ट्रेट परिसर में पिता का अनिश्चितकालीन धरना
जांच रिपोर्ट की एक अदद कॉपी पाने के लिए लगभग 65 किलोमीटर दूर से रोजाना सरकारी कार्यालयों के चक्कर काट-काटकर थक चुके रामशिरोमणि मिश्रा का धैर्य आखिरकार जवाब दे गया। अधिकारियों द्वारा हर बार अगले दिन आने का झूठा आश्वासन देकर लौटाए जाने से आहत होकर उन्होंने एक बार फिर विरोध का रास्ता चुना है।
वे रीवा कलेक्ट्रेट परिसर में धरने पर बैठ गए हैं और मंगलवार को उनके इस अनिश्चितकालीन धरने का दूसरा दिन है। कलेक्ट्रेट परिसर में तख्ती लेकर बैठे इस बुजुर्ग पिता का कहना है कि उन्होंने अपनी जवान बेटी और दुनिया देखने से पहले ही अपने नाती को खो दिया है, लेकिन सिस्टम उन्हें उनके ही खून से जुड़ी जांच रिपोर्ट देखने के लिए भी तरसा रहा है। उनका यह संघर्ष इस बात का प्रमाण है कि आम आदमी को न्याय पाने के लिए किस हद तक संघर्ष करना पड़ता है।
प्रशासन की भूमिका और आगे की राह
इस पूरे प्रकरण में रीवा जिला प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं। जब एक ओर शासन और प्रशासन पारदर्शी शासन का दावा करते हैं, वहीं दूसरी ओर एक पीड़ित पिता को अपनी ही बेटी की मौत से जुड़ी जांच रिपोर्ट की कॉपी के लिए कलेक्ट्रेट के फर्श पर बैठना पड़ रहा है। प्रशासनिक अधिकारियों का यह रवैया न केवल संवेदनहीनता को दर्शाता है, बल्कि जांच प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी पर्दा डालने का प्रयास प्रतीत होता है।
रामशिरोमणि मिश्रा ने स्पष्ट कर दिया है कि उनका यह धरना तब तक समाप्त नहीं होगा जब तक जिला प्रशासन उन्हें मजिस्ट्रियल जांच रिपोर्ट की प्रमाणित और अधिकृत प्रति उनके हाथ में नहीं सौंप देता। यदि समय रहते प्रशासन ने इस मामले में संवेदनशीलता नहीं दिखाई, तो यह आंदोलन और अधिक व्यापक रूप ले सकता है, जिससे शासन-प्रशासन की छवि पर और अधिक आंच आ सकती है।


